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Saturday, 1 June 2013

कुछ आँखें दिन रात रोती हैं, बिना गलती के सजा पाती हैं ! सोच कर देखते हैं उनकी पीढ़ा को तो लगता है मानवता कहाँ खो गई है इतना निर्दयी कैसे हो सकता है एक मानव ? निर्दोश आँखों को भी रुला रहा है !! 
जय हिन्द

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